‘ब्यावर’ इतिहास के झरोखे से.......
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✍वासुदेव मंगल की कलम से.......

छायाकार - प्रवीण मंगल (फोटो जर्नलिस्‍ट)
मंगल फोटो स्टुडियो, ब्यावर
Email - praveenmangal2012@gmail.com

19-07-2026

परदेशी ने गले लगाया अपनो ने बिसराया
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स्वतन्त्र लेखक- वासुदेव मंगल, ब्यावर सिटी

डिक्सन का प्लानिंग वैसे अर्थात् योजनाबद्ध तरीके से नया नगर बसाने के साथ ही लगते हाथ ट्राईवाल एरिया मे तीन अलग अलग संस्कृति की रियासतों का मिलाजुला बफर स्टेट सो साल के लिए बसाना मायने रखता है वह भी परदेश की अनजान जगह पर। वास्तव में उनका करिश्माई जादू ही था जिसके आगे सब ए आई - डिजिटल - एनिमेशन - साईबर सब फेल है। ऐसे भागीरथ काम को उन्होंने आसानी से कर दिखाया जो जादू से कम बात नहीं है। वास्तव में ऐसे काम के लिए बधाई के पात्र ही कहलायेगें।‘
सबसे पहले तो बाहर के लोगों को नोटिफिकेशन के जरिये बाहर से बुलाकर बसाना सुरक्षा का माकूल प्रबन्ध करना। उनको व्यापार की हर तरह की सुविधा प्रदान करना उसके बाद बफर स्टेट की पृष्ठ भूमि की ट्राईवाल पहाड़ी व मैदानी मेर जाति से सौहाद्रपूर्ण सम्पर्क कर उनकी जोत कपास की पैदावर के साथ अन्य कृषि पैदावार और चरागाह से प्राप्त ऊन आदि वस्तुओं को नया नगर लाकर बेचने के लिए राजी करना।
साथ ही नया नगर अलग अलग धर्मों और जाति के लिए लोगों के लिए अलग उनकी अलग कोलोनी बनाना ताकि उनका संगठन बना रहे। उनके रहने के लिए पक्के मकान, सामाजिक - धार्मिक - व्यापारिक - सांस्कृतिक उत्सव त्यौहार का प्रबन्ध। साथ ही स्वास्थ्य - चिकित्सा - शिक्षा का माकूल प्रबन्ध करना।
ट्राईवाल आदिवासी कृषकों के लिए उनकी जोत (पैदावार) को बेचकर वाजिव दाम दिलवाने का प्रबन्ध करना आदि आदि। किसानों को रोज उनकी ऊपज का नकद भुगतान करना। कच्चे माल का रोज निस्तारण करना। इस प्रकार एक परदेशी का हृदय परिवर्तन हुआ। ब्यावर की जमीं को तस्लिम कर इसी में दफन हो गया वह सर्वधर्म के प्रणेता थे। सिक्के के दो पहलू होते है। पहले पहलू के इतिहास की दास्तान आपको बताई। अब सिक्के के दूसरे पहलू का वृतान्त आपके सामने हैः-
जैसे निनान्नवे साल की लीज 1937 में समाप्त हुई। मेरवाड़ा बफर स्टेट का स्ट्रक्चर. समाप्त हुआ। डिक्सन तो 1857 मे ही ब्रह्मलीन हो गए थे परन्तु बरतानियत सरकार ने ब्यावर में कमिश्नर ने ही अंग्रेजी राज को बदस्तुर भारत के साथ ही 1937 तक उसके बाद अंग्रेजी के विजित हुकूमत 37 (सेतिस) गाँवों का ईलाका मेरवाड़े का अजमेर की अंग्रेजी सरकार के साथ जोड़कर अजमेर मेरवाड़ा शासन देश के आजाद होने तक बदस्तूर जारी रहा।
स्वतन्त्रता के साथ भारत देश ने 26 जनवरी 1950 से गणतन्त्र प्रणाली अंगीकार की तब अजमेर मेवाड़ा ‘स’ श्रेणी का छोटा अजमेर राज्य भारत देश का बना। यह व्यवस्था हमारे द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि रहनुमाओं ने अजमेर लेजिस्लेटिव एसेम्बली के द्वारा 1952 के पहले आम चुनाव मे सम्भाली जो 1 नवम्बर 1956 को अजमेर राज्य को राजस्थान राज्य मे समाहित करने पर बदली। अजमेर राज्य की सूरतहाल इस प्रकार हुई (रही) अजमेर को राजस्थान प्रदेश का 26वाँ जिला बनाया एवं ब्यावर को उपखण्ड अतः अजमेर मेरवाड़ा जो कभी अंग्रेजी सल्तनत थीं उसका हश्र आपके सामने है अजमेर को राजस्थान की राजधानी नहीं बनाने के एवज में तीन राज्य स्तरीय बड़े प्रशासनिक कार्यालय देकर आँसू पोछे गए। ये इस प्रकार हैः- पहला राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन (राजस्थान सार्वजनिक सेवा आयोग) दूसरा रेवेन्यु बोर्ड (राजस्व - मण्डल) और तीसरा बोर्ड ऑफ सेकेण्डरी एज्यूकेशन (सेकेण्डरी शिक्षा मण्डल)।
इसी प्रकार ब्यावर को अजमेर जिले का उपखण्ड बनाने पर मात्र चीफ मेडीकल एण्ड हेल्थ ऑफीसर का तकमा देकर राजस्थान की सुखाड़िया सरकार नीतिगत फैसले के उलट व्यवस्था अमल में लाकर मात्र जयपुर महाराज सवाई मानसिंह द्वितीय को खुश करने के लिए राजस्थान की राजधानी जयपुर बरकरार रखने के लिए।
इतना बड़ा राजनैतिक धोका किया गया अजमेर और ब्यावर (मेरवाड़ा) की तत्कालिन अंग्रेजी रियासत के साथ भगवान इनको कभी माफ नहीं करेगा।
हमारे अपने ही बेगाने हो गए तब क्या किया जाए? यदि हरिभाऊ उपाध्याय और बृजमोहनलाल शर्मा मात्र मिनिस्ट्री के लोभ में न आकर नीतिगत फैसले पर अडीग रहते तो आज सत्तर साल बाद अजमेर और ब्यावर का सिनेरियो कुछ और ही होता। अगर अजमेर राजधानी होती तो ब्यावर भी राजधानी से ज्यादा ही आबाद होता। इसलिए ही तो कहा है राजनीति में कौन-कब बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता जैसा कि अजमेर राज्य के शर्मा बन्धुओं ने खेल किया। मिनिस्टर बनने के चक्कर मे अजमेर और ब्यावर के भाग्य को बदल दिया। क्या मिला इनको ऐसा करने से? ये तो वो ही जाने। अजमेर और ब्यावर तो इनके कार गुजारी से अपने भाग्य पर आँसू बहां रहे हैं। आज ब्यावर और अजमेर दोनो चमन होते। इसीलिए तो कहा है अपनो ने बिसराया। अजमेर को राजस्थान में मिलाने पर दोनों मिनिस्टर तो वैसे भी सामान्य स्थिति में बनते चूंकि अजमेर और मेरवाड़ा अंग्रेज़ी रियासत के रहने से इन दोनों का महत्व था अजमेर राज्य में मिनिस्टर रहते हुए।
आज भारत को आजाद हुए सत्तर बरस हो गए। राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत देश का सबसे बड़ा राज्य है। जमीन क्या नहीं कर सकती? रेगिस्तान है तो क्या हुआ इसके तल की गहराई में तेल और गैस के अविरल भण्डार बह रहे है। अगर शासन अनुसन्धान के तौर पर इस अर्से में तकनीक साधनों का उपयोग कर वैज्ञानिक तरीके अपनाये होते तो।
आप देखिये राजस्थान जो 1949 से पहले राजपूताना होता था स्वतन्त्रता के बाद भी मात्र सामन्त शाही जागीर दारी चौगा पहीने ही रहा। वो ही पच्चीस देशी रियासते सड़सठ साल तक जिले के रूप मे बनी रहीं। क्यों नहीं पन्द्रह सरकारों ने अब तक इनके क्षेत्रफल के आकार को छोटा करके प्रयोग के तौर पर ही सही विकास किया होता तो।
आज तो राजस्थान भी भारत के अन्य छोटे छोटे राज्यों से बहुत आगे बढ़ गया होता अगर ऐसा किया जाता स्वतन्त्रता से ही तो ।
 

 

इतिहासविज्ञ एवं लेखक : वासुदेव मंगल
CAIIB (1975) - Retd. Banker

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