‘ब्यावर’ इतिहास के झरोखे से....... 
www.beawarhistory.com
✍वासुदेव मंगल की कलम से.......  

छायाकार - प्रवीण मंगल (फोटो जर्नलिस्‍ट)
मंगल फोटो स्टुडियो, ब्यावर
Email - praveenmangal2012@gmail.com


सन 2007 से भारत के बाजारीकरण के शासन मे आमूलचूल परिवर्तन से भारत में ग्लोबल मार्केट का सिनेरियो
------------------------------------------
लेखक: वासुदेव मंगल, ब्यावर
प्रस्तावनाः
सन् 1991 के चुनाव में केन्द्र में काँग्रेस पार्टी शासन में आई थीं। परन्तु बड़ी समस्या उसके सामने शासन करने में आर्थिक संकट था जिससे उबरने का तत्कालिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री मनमोहन सिंहजी के सामने विकट था। राजीव गाँधी की श्री पेरम्बदटूर मे चुनाव प्रचार के दौरान 21 मई सन् 1991 मे धनु नाम की फियादीन ने मंच पर बम विस्फोट से हत्या कर दी थी शासन की बागडोर सम्भालने का बड़ा भारी प्रश्न था काँग्रेस पार्टी के सामने। अब करें तो क्या करे ?
ऐसी स्थिति में श्री मनमोहनसिंहजी ने नरसिम्हाराव जी को इस शर्त पर प्रधानमन्त्री बनने के लिए राजी किया कि वित्त मन्त्री का कार्य स्वयं मनमोहन सिंहजी देखेंगे। कारण देश का खजाना खाली था जो शासनकर्ता के सामने भयंकर आर्थिक समस्या थी।
नरसिम्हारावजी के प्रधानमन्त्री के नेतृत्व मे कांग्रेस पार्टी शासन में आ गई। वित्त मंत्री का पद श्री मनमोहनसिंहजी ने सम्भाला।
चूँकि मनमोहनसिंहजी स्वयं अर्थ शास्त्री थे। उन्होंने इंग्लैण्ड के तत्कालिन शासन को भारत के रिजर्व के सोने के भण्डार को गिरवी रखकर उनकी इस शर्त पर मुद्रा का लोन लिया कि पन्द्रह साल बाद भारत के मार्केट को ग्लोबल कोमोडिटी के मार्केट में बदल दिया जायेगा। यह पन्द्रह साल सन् 2006 ई० सन् तक का था।
सन् 1996 से आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तीन बार लगातार 1998, 1999 से सत्ता में आकर श्री अटलबिहारी बाजपेई के प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में केन्द्र के शासन मेें सन् 2004 तक रही। सन् 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी मनमोहनसिंहजी के प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में सत्ता मे आई। दोबारा 2009 के आम चुनाव में भी मनमोहनसिंहजी दूसरी टर्म के लिए प्रधानमन्त्री बने।
सन् 2004 से 2009 के बीच मे सन् 1991ई० वाले करार के पन्द्रह साल की अवधि सन् 2006 मे समाप्त हो गई थीं। अब उन्हीं के प्रधानमन्त्री काल में सन् 2007 में हिन्दूस्तान का मार्केट ग्लोबल कोमोडिटी मार्केट बनता है। इससे पहले भारत के बाजार पर भारत देश का ही एकाधिकार रहा। परन्तु 2007 में ग्लोबल कोमोडिटी मार्केट से प्रतिस्पर्धा बढ़ी। अतः मुद्रा मार्केट का डिमाण्ड और सप्लाई का सन्तुलन कोमोडिटी मार्केट के डिमाण्ड एण्ड सप्लाई पर सीधा पड़कर मुद्रा और वस्तु बाज़ार को असन्तुलित उत्तरोत्तर करता रहा भविष्य में इसका स्पष्ट कारण अमुक ग्लोबल वस्तु का भारतीय करेन्सी में महंगा होना रहा जिससे विदेशी जिन्स सस्ते होने से विदेशों का माल भारत के मार्केट मे सस्ता होता रहा परिणामतः भारत का मुद्रा कोष शनैः शनैः उत्तरोत्तर सन् 2007 से कम होता गया भारत का मुद्रा, चुनांचे भारत देश का राजकोषिया घाटा उत्तरोत्तर बढ़ता रहा। परिणाम स्वरूप देश कर्जरूपी अर्थ व्यवस्था दर प्रतिवर्ष दर बढ़ती गई। इधर मुद्रा विनिमय मे डालर के मुकाबले रुपये दर घटती रही। यह स्थिति आज भी है।
तीसरा कारण- भारतीय रुपये के मुद्रा की दर घटने से अमुख जिन्स की किमत बढ़ती रही। अतः वस्तु के चुकाने में ज्यादा भारतीय मुद्रा का भुगतान वस्तु कीमत के कारण बढ़ता रहा जो आज भी जारी है। इसका सीधा सा प्रभाव मुद्रा का राजकोषिय घाटा आज भी द्रुत गति से बढ़ रहा है जो देश के लिए असहनीय है। यहाँ तक की सैकड़ों लाखो करोडो रूपयों में है जो देश के लिए चिन्ता का विषय है। ऐसा नहीं होना चाहिए देश का विकास देश का प्रोडक्शन पर आधारित होना चाहिए जो नहीं है। सरकार की आत्मनिर्भर थीम नगण्य है। अतः प्रति वर्ष देश का राजकोषिय घाटा ज्यामिति गति से बढ़ता ही जा रहा है।
ऐसा क्यों हो रहा है? इसका सीधा कारण भारत की जनशक्ति के अनुपात में रोजगार नगण्य है। उत्तरोत्तर महंगाई के कारण मुद्रा की क्रम शक्ति का ह्रास होता जा रहा है। सरकार का ध्यान रोटी रोजी पर न होकर ढांचागत विकास पर है जिससे भारत का मुद्रा बाजार असन्तुलित हो गया है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि भारत मे आयात शुल्क नहीं के बराबर है। दूसरा कारण विदेश अपने प्रोडक्ट पर सबसिडी देता है। तीसरा कारण विदेशी माल के क्वालिटी है। चौथा कारण विदेश निर्माता को अपने देश में कच्चा माल सस्ता सुलभ करता हैं। पांचवा कारण पावर सस्ती उपलब्ध होती है विदेश में प्रोडक्शन में। ये सारे घटक विदेशी माल के भारत के ग्लोबल मार्केट मे बिकने का रहा हैं। इस स्पर्धा में भारत का माल महंगा होता है। सरकार को इसके रूट कोज का पता लगाकर इसमें आमूल चूल सुधार करना चाहिए। वर्तमान मे सबसे बड़ा ड्रा फेक्टर ए आई भी है। अगर ए आई फ्रैक्टर है तो ड्रा फेक्टर है तो भारत सरकार दुनिया का सबसे बड़ा जनसंख्या वाले भारत देश मे बेरोजगारी के कारण विकास कर ही नहीं सकती चाहे अन्य कितने ही सुधार कर लेें। भारत का ग्लोबल मार्केट असन्तुलित ही रहेगा। अतः मुद्रा स्फीति को रोकना होगा।
सुझावः
अगर भारत सरकार भारत की जन शक्ति को एम एस एम ई योजना के सुक्ष्म लघु मध्यम उद्यम फेक्टर के तहत या श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने हेतु विकसित भारत गारन्टी फोर रोजगार एण्ड आजीविका मिशन (ग्रामीण) के तहत् ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने पर ए आई से मुकाबला किया जा सकता है नहीं तो कदापि नहीं। अतः सरकार को मनन करके सरकार की दोनो योजनाओं को सफल किया जा सकता है। रोजगारों को उत्पादन के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराना चाहिए सरकार को। फिर सस्ती पावर (बिजली) रोजगार उत्पादकों को मुहैय्या कराई जानी चाहिए। फिर निर्मित माल को बेचने में सरकार को सब्सीडी दी जानी चाहिए। तब जाकर भारत का निर्मित माल सस्ता पडेगा अन्यथा कदापि नहीं। जैसा कि चीन भारत के मार्केट में करता है।
02.02.2026
 

ब्यावर के गौरवमयी अतीत के पुर्नस्थापन हेतु कृत-संकल्प

इतिहासविज्ञ एवं लेखक : वासुदेव मंगल
CAIIB (1975) - Retd. Banker

Website http://www.beawarhistory.com
Follow me on Twitter - https://twitter.com/@vasudeomangal
Facebook Page- https://www.facebook.com/vasudeo.mangal
Blog- https://vasudeomangal.blogspot.com

Email id : http://www.vasudeomangal@gmail.com 
 



 


Copyright 2002 beawarhistory.com All Rights Reserved