‘ब्यावर’ इतिहास के झरोखे से....... 
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✍वासुदेव मंगल की कलम से.......  

छायाकार - प्रवीण मंगल (फोटो जर्नलिस्‍ट)
मंगल फोटो स्टुडियो, ब्यावर
Email - praveenmangal2012@gmail.com


ब्यावर का 191 वाँ स्थापना दिवस
आलेख: वासुदेव मंगल, स्वतन्त्र लेखक, ब्यावर
10 जुलाई ईसवी सन् 1835 में कर्नल चार्ल्स जार्ज डिवसन (जी०सी० डिवसन) ने राजपुताना गजेटियर मंे नया नगर बसाने का नोटिफिकेशन जारी किया।
1 फरवरी 1836 को नये नगर की नींव अजमेरी गेट के दाहिने गोखे के नीचे रखी। ईसाई धर्म के पवित्र चिह्न क्रॉस (सूली) की प्रतिकृति पर शहर नया नगर तहसील बनाई गई। इस बात को आज 190 साल बीत गए। आज 191वाँ स्थापना दिवस है।
सन् 1838 मे इसे वूल एण्ड कॉटन का तिजारती केन्द्र बनाया गया। इसी की पृष्ट भूमि में अंग्रेजों के विजयी राजस्व गांवों के साथ मेवाड़ और मारवाड़ की देशी रियासतों से कुछ गांवों को लीज पर लेकर मेरवाड़ा बफर स्टेट के नाम से नो परगनो क्रमशः़ नयानगर, मसूदा, विजयनगर, बदनौर (बदनपुर), भीम, टाटगढ़ (बरसावाड़ा), आबू रोड रायपुर और जैतारण के साथ मेरवाड़ा बफर बनाया जिसका मुख्यालय वि-वेयर नाम रखा। इसकी सीमा उत्तर में नरवर, दक्षिण मे दिवेर, पूरब मे बघेरा और पश्चिम मे बबायचा थीं। यह सो मील लम्बा व पचास मील चौड़ा पांच हजार वर्ग मील का क्षेत्रफल था।
ब्यावर के अतीत का स्वर्णकालः-
सन्1840 मे पूरे भारत वर्ष मे व्यापार के आठ-नो केन्द्र थे। सिन्ध प्रान्त में मीरपुर खास, पंजाब में फाजिल्का, उत्तर भारत में कानपुर, मध्य भारत मे इन्दौर, बम्बई प्रान्त मे बम्बई, अहमदाबाद, भावनगर, राजकोट और राजपूताना में ब्यावर। ऊन और रुई की व्यापारिक मण्डी। 1840 में तेजाजी का मेला, 1842 मंे मकानों के लिए जमीनों के पट्टे। 1850 में हालैण्ड वर्नाक्यूलर प्राईमरी स्कूल, 1851 में बादशाह मेला, 1852 में डिक्सन अजमेर रियासत के भी कमिश्नर कम सुपरिन्टेण्डेन्ट बना दिये गए। 25 जून 1857 में डिक्सन का ब्यावर मे निधन। 1 दिसम्बर 1858 मे बिट्रेन की सरकार ने भारत का शासन अपने हाथ मे ले लिया। 1859 मे स्काटलैण्ड से विलियम शूल ब्रेड के नेतृत्व में पादरियों का एक दल ब्यावर आया जिसने ईसाई धर्म प्रचार के साथ इस ईलाके में 8-9 चर्च बनवाये, मिशन बायज गर्ल्स स्कूल खोले, शफारखाना खोला, म्युनिसिपल कमेटी बनाई। सुरक्षा के लिए कोतवाली खोली, दवाखाना खोला। तात्पर्य सबसे पहिले ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। फिर 1881 में क्रान्तिकारी सन्यासी स्वामी दयानन्द ने आर्य समाज संस्था का प्रचार प्रसार किया। ब्यावर में आर्य समाज स्थापित किया। 1872 में ब्यावर में कमिश्नर राज शुरू हुआ। 1875-76 मंे रेल्वे लाईन आ जाने से सवारी माल गाड़ी शुरू हुई। परिणामस्वरूप 1880,85 से 92 तक श्यामजी कृष्ण वर्मा ने व्यापार मण्डल की स्थापना की। 1892 तक राजपूताना कॉटन प्रेस, जिनिंग प्रेस व कृष्णा क्लाथ मिल्स आरम्भ हो गई। 1904 मे स्वामी प्रकाशानन्दजी ने सनातन धर्म प्रकाशनी प्राईमरी पाठशाला खोली। 1908 मे एडवर्ड मिल्स स्थापित हुई। 1911 में हिन्दू कमिश्नर श्री ब्रजजीवन लालजी ने कार्य भार सम्भाला। 1913ई० श्यामगढ़ के किले में ठाकुर गोपाल सिंहजी के नेतृत्व मे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी आर्मी की स्थापना हुई। 1919 में घीसूलालजी जाजोदिया एवं स्वामी कुमारानन्दजी ने ट्रेड यूनियनस् की व कांग्रेस पार्टी दफ्तर की स्थापना की। 1925 मंे दी महालक्ष्मी मिल्स आरम्भ हुई। 1928 मे सनातन धर्म इन्टर कॉलेज शुरू हुआ। 1932 में मोहम्मदली मेमोरियल स्कूल शुरू हुई। 1934 मंे फत्तेहपुरिया बाजार में रायल सिनेमा शुरू हुआ। 1934 में ही महात्मा गाँधी ब्यावर आये। 1938 में देशी रियासतों में प्रजा मण्डल स्थापित हुए। 1939 में ही द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ। 1939 में साह साहिब ने छावनी में पावर हाऊस लगाया। 1944 मे साहजी ने रूपबानी सिनेमा बनवाया। 1945 में पाण्डितजी ने अजमेरीे दरवाजेे बाहर रॉयल टाकीज बनाया। 1945 के 15 अगस्त को द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ। 1944 को लेखक वासुदेव मंगल का जन्म हुआ। 1945 मे सुभाष चन्द्र बोस रसिया के पूर्वी मन्चूरिया प्रान्त के डिरेना नगर गए। 15 अगस्त 1947 मे भारत आजाद हुआ। 1939 मे लेखक के पिता बाबूलालजी के तपेदिक की बिमारी हुई। देवास के सेनेटोरियम मंे ईलाज करवाया, ठीक हुए। 1942 में लेखक के पिताजी के नानाजी सेठ गजानन्दजी पौद्दार का निधन हुआ। 1940 में श्री जयनारायण व्यास श्री जैन गुरुकूल स्कूल के हेड मास्टर बने। 1941 में मुकुट बिहारीलालजी भार्गव सत्याग्रह आन्दोलन में गये किया जेल गए। 1942 मंे भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ। 1945 में 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) बना।
सन् 1939 मे लीज की अवधि के समाप्ति पर रायपुर जैतारन को पाली जिले में भीम (मण्डला) को उदयपुर मंे, बदनोर को भीलवाडा जिले मंे और आबू पहले तो गुजरात मंे, फिर आन्दोलन होने पर राजस्थान के सिरोही जिले मे रखा गया। इस प्रकार मेरवाड़ा स्टेट का विघटन करके छोड़ा। बाकी ईलाके को अजमेर राज्य का जिला बनाया गया जो 26 जनवरी 1950 मे भारत का ‘स’ श्रेणी का राज्य बना अजमेर। 1951 में पहली आम जनगणना हुई। 1952 मे पहला आम चुनाव हुआ। जिसमे ब्यावर से श्री मुकुट बिहारी लाल भार्गव संसद सदस्य चुने गए।
सन् 1953 मंे राज्य पुर्नगठन आयोग स्थापित हुआ। जिसने अजमेर को राजस्थान में विलय कर राजधानी और ब्यावर को जिला बनाने की सिफारिश की गई जिसकी समीक्षा समिति ने भी सर्व सम्मति से अनुमोदन किया।
सन् 1956 की 1 नवम्बर को अजमेर छोटे राज्य को राजस्थान में मिलाते वक्त अजमेर को राजस्थान प्रदेश का, बरबस ना इन्साफी करते हुए तत्कालिन राजस्थान प्रदेश के मुख्यमन्त्री श्री मोहनलाल सुखाड़िया ने जिला और ब्यावर को अजमेर जिले का सब डिविजन अर्थात उपखण्ड बनाये जाने की अधिसूचना जारी कर दी। तब से ब्यावर राजनीति की अवनति का दंश झेल रहा था। यहाँ तक की सन् 2013 में ब्यावर को मात्र एक तहसील का उपखण्ड रख छोड़ा। 7 अगस्त सन् 2023 को राजस्थान के मुख्यमन्त्री श्री अशोक गहलोल ने ब्यावर को राजस्थान प्रदेश का जिला बनाये जाने की अधिसूचना जारी की।
इस प्रकार छासठ साल बाद ब्यावर ने अपनी खोई हुई राजनीति की जमीनी विरासत को पुनः हासिल किया। बड़ी खुशी की बात है। अब ब्यावर जिले के अवाम को फिर से अपनी खोई हुई राजनीति की विरासत अस्मत का अतीत की भाँति पूर्नजीवित कर देश के सर्वाेत्तम जिले के रूप मे प्रति स्थापित करना है। इसी शुभ कामना के साथ आज ब्यावर नया नगर स्थापना के 191 वें दिवस पर आप सब ब्यावर जिले निवासियों को लेखक व परिजन की ढेर सारी शुभकामनाएँ।
यह एक संयोग ही कहा जाये कि नेशनल हाईवे संख्या 162 की संरचना भी हूबहू क्रॉस की आकृति की है। आप देखिये ब्यावर से शुरू होकर नेशनल हाईवे संख्या 14 जो काण्डला बन्दरगाह तक 400 मील तक जाता है और दूसरा हाईवे संख्या 8(आठ) जो उदयपुर हिम्मत नगर होता हुआ अहमदाबाद बम्बई जाता है उसकी संरचना भी ब्यावर के उद्भव स्थान से ही होती है। इन दोनों हाईवें में 4-7 किलोमीटर की दूरी भी इस ऐतिहासिक क्रॉस को दर्शाता है जो धूरी ब्यावर से ही शुरू हुई है। अतः कहा जा सकता है कि ब्यावर का इतिहास इसकी सड़कों, चौराहों की संरचना में भी जीवित है। इसके अतीत और वर्तमान एक अदृश्य रेखा से जुडे़ हुए है जो स्वाभाविक और व्यवहारिक प्रमाण है जीवन के। है ना एक प्राकृतिक संरचना, जो जमीन पर ब्यावर के सिवाय कहीं पर भी नहीं है। वाह रे, मेरे ब्यावर महान् है। तू धन्य है, और धन्य है तेरे निवासी।
ये उदाहरण दो देशी रियासतों मारवाड़ और मेवाड़ की सभ्यता संस्कृति की मिलन का सेतू है जो जमीन पर और कहीं पर भी नहीं है ब्यावर के सिवाय। अतः यह एक जमीनी हकीकत है जिसे वर्तमान की केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों को मानना पड़ेगा।
02.02.2026
 

ब्यावर के गौरवमयी अतीत के पुर्नस्थापन हेतु कृत-संकल्प

इतिहासविज्ञ एवं लेखक : वासुदेव मंगल
CAIIB (1975) - Retd. Banker

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