‘ब्यावर’ इतिहास के झरोखे से....... 
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✍वासुदेव मंगल की कलम से.......  

छायाकार - प्रवीण मंगल (फोटो जर्नलिस्‍ट)
मंगल फोटो स्टुडियो, ब्यावर
Email - praveenmangal2012@gmail.com



अग्रवालों की उत्पत्ति
रचनाकार- वासुदेव मंगल, ब्यावर
भगवान ने अपने मुख से ब्राहम्ण और भुजा से क्षत्रिय और जांघ से वैश्य और चरण से शुद्रों को बनाया। वैश्य को चार कर्म का अधिकार दिया। पहला खेती, दूसरा गऊ की रक्षा, तीसरा व्यापार, चौथा ब्याज।
जैसे वेद और यज्ञादिक का स्वामी ब्राम्हण, राज्य और युद्ध का स्वामी क्षत्रिय वैसे ही धन का स्वामी वैश्य है और ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों को द्विज संज्ञा है और तीनों वर्ण वेद कर्म के अधिकारी है।
पहला मनुष्य जो वैश्यों में हुआ उसका नाम धनपाल था जिसे ब्राम्हणों ने प्रतापनगर में राज्य पर बिठाकर धन का अधिकारी बनाया। उसके यहां आठ पुत्र और एक कन्या हुई। कन्या का नाम मुकुटा था और वह याज्ञवलक्य ऋषि से ब्याही गई। उन आठ पुत्रों के नाम शिव, नल, अनिल, नन्द, कुन्द, कुमुद, वल्लभ, और शेखर। इन पुत्रों को अश्वविद्या शालिहोत्र के आचार्य विशाल राजा ने अपनी आठ बेटियां ब्याह दी थी। इन कन्याओं के नाम पद्यमावती, मालती, कान्ति, शुचा, भव्या, भवा, रजा और सुन्दरी ये ही वैश्य लोगो की मातृका है। इन कन्याओं का ब्याह नाम क्रम से हुआ। इन आठ पुत्रों में नल नाम का पुत्र योगी और दिगम्बर होकर वन में चला गया और सात पुत्रों ने सात द्वीप पर अधिकार पाया और पृथ्वी पर वंश फैलाया। जम्बू द्वीप में विश्य नाम का राजा हुआ जो शिव के कुल में था। विश्य के वैश्य हुआ। वैश्य के वंश में एक सुदर्शन राजा हुआ जिसके दो स्त्रियां थी। इनके नाम सेवती और नलिनी था। इनका पुत्र धुरन्धर हुआ। इसी धुरन्धर का पड़पोता समाधि नाम का वैश्य हुआ था। इसी समाधि के वंश में मोहनदास बडा प्रसिद्ध हुआ जिसने दक्षिण भारत में कावेरी के तट पर श्री रंगनाथजी के बहुत सारे मन्दिर बनवाये। मोहनदास का पड़पोता नेमिनाथ हुआ जिसने नेपाल बसाया और उसका पुत्र वृन्दा हुआ जिसने श्री वृन्दावन में यज्ञ करके वृन्दा देवी की प्रतिमा स्थापित की। इस वंश में गुर्जर बहुत प्रसिद्ध हुआ जिसके नाम से गुजरात देश बसा है। इसके वंश में हीर नाम का एक राजा हुआ जिसके रंग इत्यादिक सौ पुत्र थे। इनमें रंग ने तो राज्य पाया और बाकी सब अपने कर्मों से बुरे हो गये। फिर तप के बल से इन लोगों ने अपने वंश चलाये- जिनके वंश के लोग वैश्य हुए। पर उनके कर्म शुद्रों के से थे। रंग का पुत्र विशोक हुआ। उसके पुत्र का नाम मधु और उसके पुत्र का नाम महीधर हुआ। महीधर ने श्री महादेवीजी को प्रसन्न करके बहुत सारे वर प्राप्त किये इसके वंश में सब लोग व्यवहार मंे चतुर और सब धन और पुत्र से सुखी थे।
इसी वंश में वल्लभ नाम का एक राजा हुआ और उसके घर में बडे प्रतापी अग्र राजा उत्पन्न हुए। इनको अग्रनाथ और अग्रसेन भी कहते थे। यह बडा प्रतापी राजा था। इसने दक्षिण भारत में प्रतापनगर को अपनी राजधानी बनाया। यह नगर धन, रत्न और गऊ से पूर्ण था। यह ऐसा प्रतापी था कि इन्द्र ने भी इससे मित्रता की थी। एक समय नाग लोग से नागों का कुमुद नाम का राजा अपनी माधवी कन्या को लेकर भूलोक में आया और उस कन्या को देखकर इन्द्र मोहित हो गया और नागराज से वह कन्या मांगी पर नागराज ने इन्द्र को वह कन्या नहीं दी। और उसका विवाह राजा अग्र से कर दिया। यहीं माघवी कन्या सब अग्रवालों की जननी है और इसी नाते से हम लोग सर्पाे को अब तक मामा कहते है।
इन्द्र ने इस बात पर बड़ा क्रोध किया और राजा अग्र से वेर मानकर कई वर्ष उनकी राजधानी प्रतापनगर पर जल नहीं बरसाया और अग्रराजा से बड़ा युद्ध किया। तब भगवान ब्रम्हदेव ने दोनों को युद्ध से रोका। इससे राजा अपनी राजधानी में फिर आया और राज्य अपनी स्त्री को सौपकर आप तीर्थाे में घूमने चला गया और सब तीर्थाे में घूमकर महालक्ष्मीजी की उपासना की और काशी में आकर कपिलधरा तीर्थ पर महादेवजी का बड़ा यज्ञ करके बहुत सा दान किया। तब श्री महादेवजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और कहा कि वर मांगों तब राजा ने कहा कि, मैं केवल यही वर मांगता हूं कि इन्द्र मेरे वश में होवे, इस पर प्रसन्न होकर अनेक वर दिये और कहा कि तुम महालक्ष्मीजी की उपासना करो। तुम्हारी सब ईच्छा पूर्ण होगी यह सुनकर राजा फिर तीर्थ में चला गया और एक प्रेत की सहायता से हरिद्वार पहुंचा और वहां से गर्ग मुनि के संघ ने सब तीर्थाे में फिरा और फिर जब हरिद्वार आया तब वहां पर महालक्ष्मी की बड़ी उपासना की और देवी ने प्रसन्न होकर वर दिया कि, इन्द्र तेरे वश में होगा और तेरे वंश में कोई भी दुखी नही होगा और अन्त में तुम दोनों स्त्री पुरूष ध्रुवतारा के आसपास रहोगे और इस समय तुम कोल्हापुर में जाओ वहां पर नागराज के अवतार राजा महिधर की कन्याओं का स्वयंवर है वहां उन कन्याओं से ब्याह करके अपना वंश चलाओं। देवी से ये वर पाकर राजा कोल्हापुर गया वहां पर उन कन्याओं से बडी धूम धाम से ब्याह किया और फिरकर दिल्ली के पास के देशों में आया और पंजाब के सिरसा से लेकर आगरा तक अपना राज्य स्थापित किया और इन्हीं देशों में अपना वंश फैलाया। जब इन्द्र ने राजा के वर का समाचार सुना तब तो घबराया और उससे मित्रता करनी चाही और इस बात के लिये नारदजी को भेजा और एक अप्सरा जिसका नाम मधुशालिनी था को देकर मेल कर लिया। इसके पीछे राजा अग्रसेन ने यमुनाजी के तट पर श्री महालक्ष्मी का बडा तप किया और श्री महालक्ष्मी ने प्रसन्न होकर ये वर दिये कि आज से यह वंश तेरे नाम से होगा और तेरे कुल की मैं रक्षा करने वाली और कुलदेवी रहूंगी और इस कुल में मेरा दिवाली का उत्सव सब लोग मानेगें यह वर देकर श्री लक्ष्मीजी चली गई। तब राजा ने आकर अपना राज बसाया उस राज्य की उत्तरी सीमा हिमालय पर्वत और पंजाब की नदियां थी और पूरब और दक्षिण की सीमा श्री गंगाजी और पश्चिम की सीमा यमुनाजी से लेकर मारवाड देश के पास के देश थे - इनके वंश के लोग सर्वदा इन्हीं देशों में बसे इसमें मुख्य अगरवाल लोग वोही है जो पंजाब प्रान्त से इधर मेरठ आगरा तक बसने वाले है।
अगरवालों के बसने के मुख्य नगर ये है:-
1. आगरा - जिसका शुद्ध नाम अग्रपुर है। यह नगर राजा अग्र के पूर्व दक्षिण प्रदेश की राजधानी था। 2. दिल्ली- जिसका शुद्ध नाम इन्द्रप्रस्थ है। 3. गुडगांवा -जिसका शुद्धनाम गौडग्राम है। यह नगर अगरवालों के पुरोहित गौड ब्रम्हाणों को मिला था। इसी कारण अगरवाल प्राय माता को यही से पूजते है। 4. मेरठ - जिसका शुद्ध, नाम महाराष्ट्र है। 5. रोहतक- जिसका शुद्ध नाम रोहिताश्व है। 6. हांसीहिंसार जिसका शुद्ध नाम हिंसार देश है। 7. पानीपत- इसका शुद्ध नाम पुण्यपत्तन है। 8. करनाल- 9. कोटकांगड़ा- जिसका शुद्ध नाम नगर कौट है। अगरवालों की कुलदेवी महामाया का मन्दिर यही पर है। ज्वालादेवी का मन्दिर भी इसी नगर की सीमा पर है। 10. लाहौर इस नगर का शुद्ध नाम लवकोट है। 11.मंडी - इसी नगर की सीमा में रैवालसर तीर्थ है। 12 बिलासपुर - इस नगर में नयना देवी का मन्दिर है। 13.गढवाल 14.जींदसपीदम 15. नाभा 16.नारनौल इसका शुद्ध नाम नारेनवल है। उपरोक्त वर्णित सब नगर अग्रोहा राजधानी में थे। आगरा - अग्रोहा में दोनो नगर राजा अग्रसेन के नाम से आज तक प्रसिद्ध है। अग्रोहा नगर राजधानी में श्री महालक्ष्मीजी का विशाल मन्दिर है।
महाराज अधिराज अग्रसेन ने साढे सत्रह यज्ञ किये- इसका कारण यह है कि, जब राजा ने अट्ठारवा यज्ञ आरम्भ किया और आधा हो भी चुका था तब राजा को यज्ञ की हिंसा से बडी ग्लानी हुई और कहा कि हमारे कुल में यद्यपि कही भी कोई मांस नहीं खाता। परन्तु देवी हिंसा होती है। सो आज से जो मेरे वंश में हो उसको यह मेरी आन है कि, देवी हिंसा भी न करे अर्थात, पशु यज्ञ और बलिदान भी हमारे वंश में न होवे और इससे राजा ने उस यज्ञ को भी पूरा नहीं किया। राजा के 94 रानी और एक उपरानी थी। उसने एक एक को तीन तीन पुत्र और एक एक कन्या हुई और उसी साढे सत्रह यज्ञ से साढ़े सत्रह गोत्र हुए। कोई लोग ऐसा भी कहते हैं कि किसी मनुष्य को ब्याह जब गोत्र में हो गया तो बड़े लोगों ने एक ही गोत्र के दो भाग कर दिये। इससे साढे़ सत्रह गोत्र हुए। परन्तु यह बात प्रमाण के योग्य नहीं है। राजा अग्र के उन 72 बहत्तर पुत्र और कन्याओं के बेटे अगरवाल कहलाये। अग्रवाल का अर्थ है अग्र के बालक अग्रवालों के साढ़े सत्रह गोत्रों के नाम ये है 1. गर्ग 2. गोइल 3. गावाल 4. वात्सिल 5. कासिल 6. सिंहल 7. मंगल 8. भट्टल 9. तिंगल 10. ऐरण 11. टैरण 12. टिंगल 13 तित्तल 14. मित्त 15. तुन्दल 16. तायल 17. गोभिल और गबन अर्थात आधा गोत्र है। पर अब नामों में कुछ उलट पलट भी हो गए है राजा अग्र ने अपने सहायक गर्ग ऋषि के नाम से अपना प्रथम गोत्र किया और दूसरे गोत्रों के नाम भी यज्ञों के नाम से रखे।
राजा अग्र ने अपने कुल पुरोहित गौर ब्रम्हाण बनाये और उस काल में सब अग्रवाल वेद पढने वाले और त्रिकाल साधने वाले थे। राजा अग्र बूढे होकर तप करने चला गया और उसका पुत्र विभु राजगद्दी पर बैठा और उसके कई वंश तक राजा लोग अपने धर्म में निष्ठ होकर राज करते रहे। इस वंश में एक दिवाकर राजा हुआ जो वेद छोडकर जैन धर्म अंगीकार किया। उसने बहुत से लोगो को जैन धर्म के लिये प्रेरित किया। उसी काल में अगरवालों से वेद धर्म छूटने लगा। परन्तु अगरोहा और दिल्ली के अगरवालों ने अपना धर्म नहीं छोडा। इस वंश में राजा उग्रचन्द के समय से राज्य घटने लगा और जब शहाबुद्दीन ने चढाई की, तब तो अग्रोहा को सब तरह से नष्ट कर दिया। शहाबुद्दीन की लडाई में बहुत से लोग मारे गए और उनकी बहुत सी स्त्रियां सती हुई। जो हम लोगों के घर में अब तक मानी और पूजी जाती है। उस समय जो अगरवाल भागे वे मारवाडी और पूरब में जा बस और उनके वंशज पूरविये और पछाही अर्थात् मारवाडी अगरवाल हुए। इसी भांति उत्तराधी और दक्षिणाघी लोग भी अगरवाल हुए। परन्तु मुख्य अरवाले दिल्ली में पछाही में वो ही कहलाये जो दिल्ली प्रान्त में बच गए थे। जब मुगलों का राज हुआ तो अगरवालों कि फिर बढ़ती हुए और बादशाह अकबर ने तो अग्रवाल को अपना वजीर बनाया। उसी काल से अग्रवालों की विशेष वृद्धि हुई। अकबर के दरबार में दो मुख्य और प्रसिद्ध अगरवाल वजीर थे जिनका नाम महाराज टोडरमल और मृदूशाह था। मृदूशाही पैसा इन्हीं के नाम से चला है। महाराजा टोडरमल खत्री थे।
यह लेख महाराजा अधिराज श्री अग्रसेन जी महाराज की विक्रम संवत् 2070 की आश्विन शुक्ला प्रथमा को 5137 वीं जयन्ति पर वासुदेव मंगल, शेखावाटी रामगढ़िया नोहरा, ब्यावर वाले द्वारा लिखकर अजमेर की रिमझिम अग्रसेन विशेषांक में प्रकाशन हेतु श्री सुरेश जी गर्ग को सहर्ष समर्पित है।
 
 

ब्यावर के गौरवमयी अतीत के पुर्नस्थापन हेतु कृत-संकल्प

इतिहासविज्ञ एवं लेखक : वासुदेव मंगल
CAIIB (1975) - Retd. Banker

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