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ब्यावर की ओनोखी होली 
देवर की पीठ पर भाभी का कोड़ा
लेखक - वासुदेव मंगल


बढ़ती हुई महंगाई और धार्मिक पर्वों के प्रति घटती निष्ठा के बावजूद कुछ सामाजिक परंपराएं अपने-आप स्थापित हो जाती है, ब्यावर में होली के तीसरे दिन ‘कोडामार होली’ और ‘बादशाह की सवारी’ ऐसे उदाहरण है, जो होली से ज्यादा हर्ष-उल्लास के साथ मनाये जाते है, सदियों से स्थापित यह वे परंपराएं हैं, जिसमें रंगों से परहेज करने वाले भी इन्हें देखने और रंग-गुलाल से तर-बतर होने के लिये दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं।
चमडे़ के व्यवसाय में लगक जीनगर समाज की ओर से कोड़ामार होली, चैत्र माह की दूज, अर्थात होली के तीसरे दिन, स्थानीय पाली बाजार में आयोजित की जाती है, जीनगर समाज के अनुसार कोड़ामार होली में केवल समाज के ही पुरूष व स्त्रियां भाग ले सकते है, समाज के हर घर से स्त्री-पुरूष का आना अनिवार्य है, अन्यथा अनुपस्थित सदस्य को जाति बाहर भी किया जा सकता है, स्त्रियों में भी केवल बहुएं ही भाग लेती है, 
देवर-भाभी के मध्य रंगों की मार से भरपूर कोड़ामार होली शुरू होने से पहले स्त्री-पुरूष के अलग-अलग दल दोपहर तीन बजे निकलना शुरू हो जाते है, चंग, थाली व ढोल की ताल पर ‘रंगों की बौछार लगी है ‘भीगे मस्तों की टोली’, देवर भाभी में परदा कैसा’, ‘आयी रंगीली होली’, ‘हाय रंगरेजिन। हाय प्यारी-प्यारी हल्दी का रंगना छोड़’ आदि लोकगीत गाते हुए पाली बाजार में रंगों से भर कड़ाह के समीप पुरूषों के दल एकत्रित होने लगते है। 
बिगुल बजने के साथ ही कोड़ामार होली शुरू हो जाती है इसके लिए पाउडर के डिब्बों को विशष प्रकार से तिरछा काट कर ‘डोली’ बनायी जाती है, कड़ाहों में से होलियों में रंग पुरूष-स्त्रियों पर इस प्रकार से वार करते है कि रंग की मार स़्ित्रयों के शरीर पर चाबुक की तरह पडे़ कोडामार होली खेलती स्त्रियां फुर्ती और चालाकी से रंग की मार से अपने आपको बचाते हुए अपने ओढ़नी के बने कोडे़ से जबरदस्त मार करती है, भाभियों के कोड़ की मार कई बार इतनी घातक होती है कि देवर आने वाली होली तक चोट सहलाते रहते है। 
रंगों से भरे कड़ाह के धीरे-धीरे खाली होने के साथ कोडामार होली थमने लगती है। इसका लाईव विडियो इन्टरनेट के माध्यम से ब्यावरहिस्ट्री डाॅट काॅम पर घर बैठे देखा जा सकता है और वहीं कुछ दूर पर पांचबत्ती से ‘बादशाह की सवारी’ निकलने की तैयारियां होने लगती है। यह सवारी पूरे भारत में मशहूर है। इस सवारी की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डालते हुए अग्रवाल समाज के लोग बताते है कि मुलग सम्राट अकबर के समय कुछ घंटों के लिए अग्रवालों को बादशाहत मिली थी। उसी की याद में लगभग सवा सौ साल से बादशाह की सवारी निकाली जा रही है। 
ट्रक के अगले हिस्से पर रखी पालकी में सवार बादशाह दोनों हाथों से सवारी देखने आये लेागों पर गुलाल व अबीर की बौछार करते हैं और बादशाह की सवारी के आगे बीरबल अपना नृत्य करता चलात है, बादशाह द्वारा फैंका गया गुलाल शुभ समझकर लोग उसे अपने गल्ले-तिजोरी में रखते है। इस अवसर पर टनों गुलाल फेंकी जाता है। और नगर की सड़कें हफ्तों गुलाल के रंग में रंगी और गुलाल की महक से महकती हुई अगली होली की प्रतीक्षा में बिछी रहती है। 
यह त्यौहार अब दूरदराज के ‘सभ्य’ लोगों को भी भाने लगा है। दूर-दूर से लोग यहां की अनोखी होली देखनेे के लिए आते है। 

लेखक: ’’बादशाह’’ वासुदेव मंगल
गोपालजी मौहल्ला, ब्यावर